कल रात मैं ट्यूब पर घर लौट रहा था तो अचानक ट्रेन पर तीन आदमी चढ़े, जिनमें से एक कुछ पचास- साठ साल का हुआ होगा, और बाकी दो युवा थे. पहले व्यक्ति दिखने में अंग्रेज थे लेकिन बोल हिंदी में रहे थे, बड़ी दिलचस्पी से और चेहरे पे बड़ी दिलदार मुस्कान के साथ.
‘आप लोग कहाँ से हैं, बांगलादेश से?’
‘नहीं, इंडिया से.’
‘अच्छा, इंडिया में कहाँ से?’
‘कलकत्ता.’
तब बुज़ुर्ग को मैं भी नज़र आया. मैं देख सकता था की वे अनुमान लगाना चाहते थे कि मैं भी भारतीय हूँ या नहीं. तब घोषणा सुनाई दी कि ट्रेन १२.२० तक रुकी रहेगी. मेरी तरफ़ देखते हुए उन्होंने बड़े आश्चर्य-भरी आवाज़ में कहा, ‘बारह बीस!’ मुझे समय का अंदाजा नहीं था; लगा कि अब शायद १२.०० या १२.१० बजे होंगे. तो मैंने भी भौं ज़रा चढ़ाकर कहा, ‘बारह बीस?’
ठीक उसी पल दरवाज़े बंद हुए और ट्रेन चलने लगी. उनके चेहरे पे राहत भरी मुस्कान फैल गई. ‘आह, मुझे लगा हम आधे घंटे तक यहीं पड़े रहेंगे.’ अब मुझे भी वार्तालाप में शामिल कर दिया गया. उन्होंने पुछा कि मैं कहाँ का हूँ. मेरे ‘चेन्नई का’ कहने पर उन्हें पहले चंडीगढ़ सुनाई दिया, फिर मैंने समझाया. वे कहने लगे कि वे कभी चेन्नई तक नहीं गए लेकिन दक्षिण में बीजापुर तक गए हैं. लगभग चार साल महाराष्ट्र और गुजरात के शहरों और गाँवों में घूम चुके हैं. मेरे पूछने पर कहा कि गुजराती और मराठी भी थोड़ा बोल लेते हैं, और नागरी लिपि भी जानते हैं. भाषा-प्रवाह उनकी काफी तेज़ थी, और लहजा काफी अच्छा था, हालांकि तनिक सी विदेशी झनकार मौजूद ज़रूर थी. बंगाली लड़कों कि ओर मुढ़कर पूछने लगे कि यहाँ क्या करते हैं.
‘पढ़ते हैं.’
‘अच्छा, क्या पढ़ते हैं?’
‘कंप्यूटर साईंस.’
‘हाँ, आजकल भारतीय लोग वही पढ़ते हैं ना. मुझे लगता है जब तक दुनिया में कंप्यूटर होगा हम आज़ाद नहीं होंगे. अब हर तरफ़ इन्टरनेट है. किसी कंपनी से पूछो आप क्या करते हैं, तो कहते है इन्टरनेट पे साईट है, उस पर देख लीजिये.’
लडकों ने उनसे पुछा कि वे कहाँ से हैं.
‘आपको क्या लगता है?’
‘लगते तो यहीं के हैं.’
‘पहले आपने सोचा हुआ होगा ना, कि यह गोरा कैसे हिंदी बोल रहा है.’
कुछ-कुछ संकुचित स्वर में: ‘आप वैसे गोरे ही दिखते हैं.’
‘गोरा ही तो हूँ!’ यह कहकर जोर से हंसने लगे. मैं उनकी भावना समझ सकता था. मुझे भी काफी मज़ा आता है जब जर्मन लोग मुझे उनकी भाषा बोलते हुए पाकर हैरान होते हैं – इसके बावजूद कि मैं इतना अच्छा नहीं बोल पाता हूँ जितना ये व्यक्ति हिंदी बोल रहे थे.
इतने में उनका स्टेशन आया. उठते हुए उनहोंने कहा, ‘वैसे आज कल कहते नहीं हैं, लेकिन …’ — यहाँ जोर देते हुए — ‘शुभ रात्रि!’
August 18, 2010 at 5:10 am |
Real story? Quite an experience!
March 2, 2011 at 4:27 pm |
Beautifully expressed…. I never knew your hindi is so good. Very happy to read your blog, especially your short stories, so you are pursuing your ultimate passion for writing.But its been more than 6 months since you have written something , quite a gap….busy with Ph.D.studies…